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मित्रो
प्रसन्ता किया है !!
जब हम कोय कार्य की शरुआत करते है तब ही हमारे मन प्रसन्ता का बीजा रोपण हो जाता है
और जब हम अपनी मंजिल की और कदम बढ़ाते है तब उस में बढ़ोतरी होती है.ज्यादातर लोग ये समझते है की प्रसन्ता मंजिल के प्राप्ति की निसानी है मगर वैसा नहीं है.आप सोचो मंजिल के सफर के दौरान अगर कोय अनिछनीय घटना होती ही तो मंजिल मिलने के बाद भी प्रसन्ता नहीं होती.
हमारी मंजिल की रह में घटने वाली हर एक श्थिति हमें प्रसन्ता देती है न की मंजिल की प्राप्ति
इशलिये सच्ची प्रसन्ता प्राप्त करनी हो तो मंजिल को मुकाम समजे और राह में प्रसन्ता के साथ चले
आज ज्यादातर मनुष्य सिर्फ मंजिल की प्राप्ति केलिए कुछ भी करते है जिस से मन हमेस उद्विग्न रहता है
फिर मंजिल पे पहुंचते हुए भी वह ख़ुशी नहीं रहती जो वास्तव में होनी चाहिए
हम हमेश अपने शरीर केलिए किया कुछ नहीं करते !!!!
मगर मन की स्थिति को कभी भी नहीं नापा !!
अगर किसीका का भी शरीर कितना अच्छा हो मगर मन -बुद्धि उद्विग्न हो तो क्या वह सुख प् सकता है !!
अगर कोय भी मनुष्य मन और बुद्धि से स्टेबल हो तो शरीर चाहे केसा भी हो परिस्थितिया किसी भी
उसे चलायमान नहीं कर सकती
सुख और दुःख किया है !!
बस बाह्य मन जो नहीं स्वीकारता वह दुःख बनजाता है
और मन इच्छित हो तो सुख बन जाता है
इशलिये बाह्य मन ही सब भाव पैदा करवाता है
ओम शांति
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Reviewed by Mr. Mahesh
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December 28, 2019
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