yada yada hi dharmasya
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति
भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं
सृजाम्यहम्
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च
दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे
युगे ॥
शब्दार्थ-
मै प्रकट होता हूं, मैं आता हूं, जब जब धर्म की हानि होती है, तब तब मैं आता हूं, जब जब अधर्म बढता है तब तब मैं आता
हूं, सज्जन लोगों की रक्षा के लिए मै
आता हूं, दुष्टों के विनाश करने के लिए मैं
आता हूं, धर्म की स्थापना के लिए में आता
हूं और युग युग में जन्म लेता हूं।
ये श्लोक का भावार्थ तो सायद सभी ने समजा होगा या तो श्लोक कभी न कभी सुना होगा ।
ये श्लोक में कही भगवन ने यहे नहीं कहा की कोनसा धर्म ???
भगवन खुद श्रीमद गीता में कहते है की में निराकार हु तो वह शरीर के धर्म की तो बात नहीं करेंगे ना
कियुकी शरीर का तो कितने सारे धर्म होते है मगर सब मनुष्य शरीर को चलाने वाली शक्ति तो के आत्मा ही है।
तो भगवन इस श्लोक में जिस धर्म की बात करते है वह आत्मा के धर्म की ही बात करते होंगे ना ।
तो हमें अपने मूल रूप आत्मा का धर्म और गुण जानना बहुत जरुरी ही तो इस श्लोक का सही मतलब मिलेंगे ।
कई फिलोसोफर का भी कहना है की इस दुनिया में सब से बड़ी ताकत मनुष्य शरीर को चलाने वाली शक्ति ही है ।
कई शब्द भी है जिस पे गौर करने से भी पता चल जाता है जैसे की "आत्मा विश्वाश" आत्मबल
जो हम सब ने पठा ही है
ओम शांति
Reviewed by Mr. Mahesh
on
September 24, 2020
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